ऋगुवेद सूक्ति-- (१५) की व्याख्यातवेद्धि सख्यम् स्तृतम्। १/१५/५भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है।पद-विश्लेषण--तव = तेरा / आपकाएव ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (56) की व्याख्या" भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देव:"ऋगुवेद --1/89/8अर्थ-- हे ईश्वर ! हम अपने कानों से शुभ सुनें।यह ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (55) की व्याख्या"ऋतं च सत्यं च"ऋगुवेद--10/190/1अर्थ --नियम और सत्य ही (जगत का) आधार है।आपने जो मंत्र दिया ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या"कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जागने ...
ऋगुवेद सूक्ति--(35) की व्याख्या"स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भाव--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् ...
ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...
ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या--"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — ...
ऋगुवेद सूक्ति--(35) की व्याख्या"स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भाव--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (१०) की व्याख्या“न रिष्यते त्वावतः सखा” — (जो ईश्वर का सखा/भक्त है वह नष्ट नहीं होता) —इस ...
ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...